बाल-महिमा

(लेखक: गिजुभाई )

(अनुवाद: काशिनाथ त्रिवेदी )

 

बालक प्रभु की अनमोल देन है । बालक प्रकृति की सुन्दर-से-सुन्दर कृति है । बालक समष्टि की प्रगति का एक अगला क़दम है ।  बालक मानव-कुल का विश्राम है । बालक प्रेम का पैगम्बर है ।बालक मानस-शास्त्र का मूल है । बालक की पूजा तो प्रभु की पूजा है । बालक को प्यार देकर आप दुनिया को प्यार दे सकेंगे । बालक को प्रेम देकर आप प्रेम का रहस्य समझ सकेंगे । प्रभु को पाना हो, तो बालक की पूजा कीजिए ।  यदि परमात्मा ने कोई अति निर्दोष वस्तु उत्पन्न की है, तो वह बालक ही है । बालक के पास रहने का मतलब होता है,  निर्दोषता के साथ रहना ।  माताओं और पिताओं !  क्या कभी आपने बालक की सुन्दर और सलौनी हँसी देखी है ? क्या कभी आपने अपने सारे दुःखों को उस हँसी में विलीन होते देखा है ?  क्या आप जानते हैं कि जब बालक खिलखिलाकर हँसता है, तो उसके मुंह से नन्हें-नन्हें फूल झड़ते रहते हैं? क्या आप समझते हैं कि बालक को भोजन कराते समय आप स्वयं कैसी-कैसी बाल-लीलाएँ करते हैं ?  क्या बड़ी-से-बड़ी क़ीमत मिलने पर भी आप कभी ऐसी बाल-लीलाएँ करना पसन्द करेंगे ? यदि कभी आप अपने इस स्वर्गीय पागलपन का विचार करने बैठेंगे, तो तनिक सोचिए कि अपने बारे में आप स्वयं क्या सोचेंगे ? अपने शोक को कौन भुलाता है ? आपकी थकान को कौन मिटाता है ? आपको बाँझपन के कलंक से कौन बचाता है ? आपके घर को किलकारियों से कौन भर देता है ? माँ को गृहिणी कौन बनाता है ? जीवन के संग्राम में पिता को जंगबहादुर कौन बनाता है ? क्या आप जानते हैं कि कभी किसी माता या पिता ने अपने बालक को बदसूरत कहा है ? जब बालक बालक न रह कर आदमी बनता है,  तभी वह बदसूरत बन जाता है । बदसूरत आदमी या बदसूरत औरत का मतलब है, विकृत बालक ।  जो व्यक्ति बालक के साथ खेल नहीं पाता,  क्या वह कभी सहृदयता का दावा कर सकता है ?बालक को देखते ही आप उसको गोद में न उठा लें,  तो आपका यह दम्भ,  कि आप बाल-प्रेमी हैं,  एक क्षण के लिए भी ठिठक नहीं सकेगा ।

प्रेम के मामले में कहीं और दम्भ चल सकता है,  पर बालक के पास कभी नहीं चल सकता ।बालक तो प्रेम का दर्पण है ।  राजा हो या रंक,  मूर्ख हो या विद्वान,  गरीब हो या अमीर,  बालक के सामने कौन नहीं झुका है? कौन है कि जो बालक का प्रेम पाने के लिए उसके सामने अपना सिर झुकाता न हो !  जब बालक बिना दाँतों वाला अपना नन्हा-सा मुँह खोलता है,  तो ऐसा मालूम होता है,  मानो गुलाब का फूल खिल रहा हो !  जब बालक सुबह उठता है,  तो उसको यह सारी दुनिया नई-नई सी लगती है ।  दुनिया को भी बालक रोज-रोज नया ही दीखता है ।  रोज सवेरा होता है, और रोज माँ की गोद में एक कमल खिलता है ।

जाड़ों की सारी रात माँ से चिपककर और माँ की गोद में दुबक कर सोने और बैठने वाला बालक माँ को कितना मीठा लगता होगा ?  बालक माँ के प्रेम के कारण जिन्दा रहता है,  या माँ बालक की मिठास के कारण जिन्दा रहती है ?  जब बालक अपने नन्हें-नन्हें पाँव हिलाता है,  क्या उस समय हम यह सोचते हैं कि इस तरह वह कितनी कसरत कर लेता है, और हवा में कुल कितना चल लेता है ? या हम उसकी इस क्रिया को देखने में ही तल्लीन हो जाते हैं ?  घुटनों के बल चलने के लिए बालक जो प्रयत्न करता है, और दुनिया की बादशाहत पाने के लिए एक सुलतान जो कोशिश करता है,  क्या इन दोनों में हमको कोई फर्क मालूम होता है ? बालक का प्रयत्न कितना सहज और निर्दोष होता है,  और सुलतान के प्रयत्न कितने दोष और भयंकर होते हैं ? नागों की पूजा का युग बीत चुका है ।  प्रेतों की पूजा का युग बीत चुका है । पत्थरों की पूजा का युग बीत चुका है । मानवों की पूजा का युग भी बीत चुका है । अब तो बालकों की पूजा का युग आया है ।बालकों की सेवा ही उनकी पूजा है । नए युग का निर्माण कौन करेगा ? जन-जीवन के प्रवाह को और अस्खलित बनाए रखेगा ? आने वाले युग का स्वामी कौन बनेगा ? भूतकाल की समृद्धि को और वर्तमान की विभूति को भविष्य की गोद में कौन रखेगा ? बालक के कोश में ‘निराशा’ शब्द है ही नहीं ।  चलना सीखने की कोशिश में लगे बालक को देखिए । क्या यह कभी थकता है ? उसका उद्योग और उसकी लगन किसको अनुकरणीय नहीं लगेगी ? जब बालक चलने की कोशिश करते हुए गिरता है, तो कोई उसे मारता क्यों नहीं है ? उसे हारते देखकर भी हमें हँसी क्यों आती है ? क्या किसी तरह का कोई इनाम या लालच देकर हम बालक को हँसा सकते हैं ?हँसी बालक की बड़ी-से-बड़ी मौज है ? बालक की हँसी घर और दिल दोनों को उजाले से भरती रहती है । सोए हुए बालक की हँसी परियों के पंखों के प्रकाश की चमक-जैसी होती है । दो होठों के खुलते ही बालक की मीठी हँसी पूरे विश्व में छा जाती है । काली अन्धेरी रात में भी बालक की हँसी से माँ का सारा भय भाग खड़ा होता है ।

कहीं बालक की हँसी में अमृत तो नहीं भरा है ।  लगता है कि माँ इस अमृत से ही सदा तृप्त बनी रहती होगी ।  जब बालक आधी रात में जागता है तो उसके साथ घर के सब लोग भी आधी रात में जाग उठते हैं ।  जब जागकर बालक खेलने लगता है,  तो घर के लोग भी उसके साथ खेलने में लीन हो जाते हैं ।  बालक के साथ बूढ़े भी हँसने का आनन्द लूट लेते हैं । बड़े बालक छोटे बालकों के साथ हँसकर अपने बचपन की याद को ताजा कर लेते हैं ।  नौजवान लोग बालक की हँसी में नहाकर अपने प्रेम-जीवन की तैयारी करते हैं ।  माता-पिता तो बालक की हँसी में अपने नए जन्म का आनन्द लूटते रहते हैं ।  बालक देवलोक के भूले-भटके यात्री हैं ।  बालक तो गृहस्थों के अनमोल मेहमान हैं ।  जब इन मेहमानों की सही सेवा-सुश्रुषा नहीं हो पाती,  तो सारा गृहस्थाश्रम ही चौपट हो जाता है ।  लक्ष्मी बालक के कुंकुम् के-से लाल-लाल पैरों से ही चिपकी रहती है ।बालक के प्रफुल्ल मुख में प्रेम सतत समाया रहता है ।  बालक की मीठी हँसी वाली मधुर नींद में शान्ति और गम्भीरता छिटकी रहती है ।  बालक की तोतली बोली में कविता बहती रहती है ।खेद इसी बात का है कि वह दिव्य कविता मनुष्यों की इस दुनिया में लम्बे समय तक टिक नहीं पाती है ।  कभी आपने सुना है कि किसी ने बालक की बातों में व्याकरण की भूलें खोजी हैं ? बालक के साथ बात करते समय तो बड़े लोग भी खुशी-खुशी व्याकरण के कठोर नियमों को त्याग देते हैं, और अकसर व्याकरण-विहीन भाषा बोलने के विफल प्रयल करते हैं ।

जब से बालक व्याकरण-सम्मत बोली बोलने लगता है, तबसे उसकी बोली की मिठास घटने लगती है ।  जिनको बालक प्यारा न लगता हो, वे तो ईश्वर के निरे शत्रु ही हैं । बालक को ‘गन्दा’ कहकर उसकी ओर न देखने वाले लोग अभागे नहीं हैं, तो और क्या हैं ? बालक तो इन अभागों की तरफ भी अपने हाथ फैलाता ही है । हब्शी को तो अपने बच्चे प्यारे लगते ही हैं, किन्तु जो प्रभु-प्रेमी होते हैं, वे हब्शी के बच्चों से भी प्यार करते हैं।  कई लोग बच्चों से दूर ही दूर रहना चाहते हैं । भला,  हम उनको पामर न कहें,  तो और क्या कहें? बालक माता-पिता की आत्मा है । बालक घर का आभूषण है ।  बालक आँगन की शोभा है । बालक कुल का दीपक है ।  बालक तो हमारे जीवन-सुख की प्रफुल्ल और प्रसन्न खिलती हुई कली है । यदि आप शिक्षक बनना चाहते हैं, तो आप बालकों का ही अनुसरण कीजिए ।  यदि आप मानस-शास्त्री बनना चाहते हैं, तो आप बालकों का ही अवलोकन कीजिए । बालक तो पल-पल में जीवन-शास्त्र और मानस-शास्त्र के सिद्धान्तों को व्यक्त करता रहता है ।  तत्त्वज्ञानी लोग भी बालक में ब्रह्माण्ड के दर्शन कर सकते हैं ।  जब बालक अपनी नन्हीं आँखों से हमारी तरफ देखता है,  तो आखिर वह क्या देखता होगा ? क्या उसकी आँखों का प्रकाश हमारे अन्दर कोई प्रकाश नहीं फैलाता होगा ? आप बालक के पास आधा घण्टा ही रह लीजिए, और बिलकुल ताजे-तगड़े बन जाइए ।  ऐसा लगता है, मानो बालक आराम और विश्राम का कोई उपवन हो ।