अपने बालकों की भलाई के लिए

माता-पिता से (लेखक: गिजुभाई )

(अनुवाद: काशिनाथ त्रिवेदी)

 

अपने बालकों की भलाई के लिए हम क्या करेंगे ?  यह एक और नया सवाल ! भला, अपने बालकों के लिए हम क्या नहीं करते हैं कि हमसे ऐसा सवाल पूछा जाता है ? हम अपने बालक को खिलाते-पिलाते हैं । हम उसको खेलाते हैं और भोजन कराते हैं । हम उसको पहनाते-ओढ़ाते हैं । पाठशाला में भेजकर हम उसको पढ़ाते-लिखाते हैं । उसके लिए हम पैसा इकट्ठा करते हैं ।  इतना सब करने के बाद भी हमसे ऐसा सवाल क्यों पूछा जा रहा है ? आइए,  इस सवाल के बारे में हम थोड़ी गम्भीरता के साथ विचार करें । अपने बालक के लिए हम इतना काम तो करें ही करें ।  बालक को हम बेढंगे कपड़े न पहनाएँ । हम उसको गहनों से न सजाएँ । हम उसको साफ-सुथरा तो रखें ही रखें । अपने बालक को बुरी पुस्तकों और बुरी सोहबत से हम बचा लें । हम उसको प्राणघातक पाठशाला से जरूर ही हटा लें ।

किसी भी हालत में, अपने बालक को, कभी किसी भी तरह की, कोई सजा हम न दें । क्या अपने बालको की भलाई के लिए हम इतना काम भी नहीं करेंगे ? क्लब में जाना छोड़कर क्या हम उनको बगीचे में घुमाने नहीं ले जाएँगे ? अपने मित्रों से मिलना-जुलना छोड़कर क्या हम अपने बालकों को अजायबघर और बाज़ार दिखाने नहीं ले जाएँगे ? कुछ देर के लिए अखबार पढ़ना छोड़कर क्या हम अपने बालकों की प्यार-दुलार भरी बातें नहीं सुनेंगे ? कुछ देर के लिए अपने धन्धे की बातें भुलाकर और अपनी पढ़ाई को एक तरफ रखकर क्या हम अपने बालकों को मीठी-मीठी बातें कहकर सुलाना पसन्द नहीं करेंगे ? कुछ देर के लिए अपने मन की थोथी तरंगों को और अपनी आराम-पसन्दी को छुट्टी देकर क्या हम अपने बालकों को छोटे-छोटे गीत नहीं सुनाएंगे ? यदि सचमुच हम अपने बालकों को चाहते हैं,  तो हम नीचे लिखे काम हरगिज़ न करें !  हम उनको टोकें नहीं । हम उनका अपमान न करें । भोजन के समय तो हम उन पर कभी नाराज हों ही नहीं । किसी भी हालत में सोते समय तो हम अपने बालक को कभी रुलाएँ ही नहीं ।भोजन के समय हम बालक के आनन्द का ही विचार करें । सोते समय हम बालक के सुखमय सपनों की ही बातें सोचें । घर में जो भी बना हो, और बालक को जो भी रुचता हो, सो उसको तब तक खाने दीजिए, जब तक वह खाना चाहे ! जब तक बालक अपनी मौज के साथ खेलना चाहे उसको खेलने दीजिए !

बालक को यह कहते रहने से क्या फ़ायदा कि वह यह चीज़ खाए और वह चीज़ खाए ? रात को अपने बालक को चपत मारकर सुला देने से हम कौन बड़ी कमाई कर लेते हैं ? अपने विलास के लिए आपका पाप-पूर्ण जागरण मूल्यवान हैं, अथवा अपने बालक के निर्दोष आनन्द के लिए किया गया आपका पवित्र जागरण मूल्यवान है ? नींद लाने वाली गोली खिलाकर आप अपने बालक को क्यों सुलाते हैं? क्या इसलिए कि वह आपके आनन्द में बाधक बनता है ? कि यदि आपको आराम और विलास का ही सुख लूटना था,  तो आपसे किसने कहा था कि आप बालक को अपने बीच बुलाएँ ? क्या बालक का आपके बीच आना कोई आकस्मिक घटना-मात्र है? बालक का रात में जागना कई माँ-बापों को अच्छा नहीं लगता । क्यों? क्या इसके कारण उनको रात में बहुत जागना पड़ता है ? नाटक, सिनेमा, चौपड़, शतरंज अथवा ताश के कारण होने वाले जागरण का हिसाब किससे पूछा जाए ? किन्तु किसी को कुछ पता भी है कि बालक तो अनन्त में रमा रहता है ? बालक के आनन्द के लिए तो क्या दिन और क्या रात,  क्या सुबह,  दोपहर और शाम, सब कुछ समान ही है ! जिस दिन से हम बालक नहीं रहे, उसी दिन से हमारे जीवन में रात का घना अंधेरा छाया हुआ है । बालक को तो घनी अंधेरी रात में भी उजाला नज़र आता है । इसके विपरीत, अज्ञानी और पापी हृदय में दिन के उजाले में भी घना अंधेरा छाया रहता है। निर्दोष हृदय ही अंधेरे में उजाले का दर्शन कर पाता है ।

अपने बालकों के हित को ध्यान में रखकर हम नीचे लिखे काम हरगिज़ न करें । हम अपने पड़ोसी से लड़ें-झगड़ें नहीं । हल्के स्वभाव वाले पड़ोसियों से हम हजार हाथ दूर रहें । ओछे स्वभाव के अपने मित्रों का साथ हम छोड़ दें । दुष्ट स्वभाव के अपने भाई-बहनों को या ऐसे दूसरे सगे-सम्बन्धियों को भी हम दूर से ही नमस्कार करें । अपने परिवार में से दुर्गुणों को दूर करने के लिए उनके विरुद्ध युद्ध छेड़ने में हम ज़रा भी न डरें ।

अपने दोषों को दूर करने के लिए हम हठ योग का सहारा लें । और यदि बालक को हानि पहुँचती हो, तो उसकी माता के त्याग को भी हम अधर्म न मानें। अपने घर में बालक के लिए हमको स्वर्ग की रचना करनी हो,  तो उसके निमित्त से हम कठिन-से-कठिन आत्मबलि देने से भी न हिचकिचाएँ ! यदि हम अपने बालक को चाहते हैं, तो किसी भी हालत में हम उसको बिगड़ने न दें। घर में नौकर रखकर हम अपने बालक को न बिगाड़ें । विदेशी खिलौनों की चकाचौंध से हम उसको न बिगाड़ें । शुरू से ही हिंसा के पाठ पढ़ाकर हम अपने बालक को पशु न बनाएँ । क्या हम अपने बालकों को मुक्त नहीं करना चाहते-अपने विश्वासों की बेड़ियों से, अपने एकांगी आदर्शों से, अपने को प्रिय पढ़ाई के बन्धनों से, खुशी-खुशी अपने गले में डाली रूढ़ियों की जंजीरों से, शिष्टाचार की जड़ता से, और परतन्त्रता या पराधीनता के पाश से ? एक बार अपने समाज की अत्याचारपूर्ण उस दासता से हम स्वयं मुक्त हो लें, और फिर अपने बालकों को भी उस दासता से मुक्त करा लें। आप यह तो जानते ही हैं न, कि गुलाम आदमी का बालक तो आखिर गुलाम ही बनेगा ? आइए, हम फिर सोचें कि अपने बालकों की भलाई के लिए हम और क्या-क्या करें ? जो आज बालिका है, कल वही गृहिणी बनेगी। जो आज बालक है, कल वही नागरिक बनेगा । इनके लिए हम क्या करें ? आज ये हमसे जो कुछ सीखेंगे, कल ये वैसा ही आचरण करेंगे । आज हम जो नहीं करेंगे, आने वाले समय में इनसे वह हो ही नहीं पाएगा।

आज हम जिस चीज़ का त्याग करेंगे, उसका त्याग करना ये जरूर सीख आइए, हम फिर सोचें कि अपने बालक के हित के लिए हमको और क्या करना है? बालक हमारा भावी नागरिक है। भावी नागरिक का बीज बालक में मौजूद है। जैसा हमारा बालक होगा, वैसा हमारा भावी नागरिक बनेगा। आइए,  हम सोचें कि अपने ऐसे बालक के लिए हमको क्या करना चाहिए।

बालक भावी कुल का दीपक है । बालक भावी पीढ़ी का प्रकाश है ।  बालक भावी जनता का पैग़म्बर है ।  अपने ऐसे बालक के लिए हम क्या करेंगे ? भगवान ने हमको बालक इसलिए दिया है कि उसको पाकर हम अपने जीवन को प्रकाशित कर ले । नया जीवन जीने के लिए भगवान ने हमको बालक दिए हैं । हमारे अन्दर नई चेतना जगाने के लिए भगवान ने हमको बालक दिए हैं । कल्याण के पथ पर आगे बढ़ने के लिए भगवान ने हमको बालक दिए हैं ।

स्वयं भगवान ने हमको जो बालक दिए हैं, उन बालकों के लिए हमको क्या-क्या करना चाहिए ? हम सोचें कि बालक का सुख किन बातों में है ।  हम यह जरूर समझ लें कि-बालक का सुख उसको अपने ही हाथों खाने देने में है । कोई उसको खिला दिया करे इसमें बिलकुल नहीं । बालक का सुख उसको खुद ही चलने देने में है । उसको गोद में उठा लेने में हरगिज नहीं । बालक का सुख उसको खुद ही खेलने देने में है । उसको खेलाने में हरगिज़ नहीं ।

बालक का सुख उसको खुद ही गाने देने में है । इसमें नहीं कि कोई उसके सामने गाए या उसको गाने के लिए कहे । बालक का सच्चा सुख सब कुछ स्वयं बालक को ही करने देने में है । इसमें नहीं कि कोई उसके सहज अधिकारों को उससे छीन ले ।